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shivup |
Hindi Now Uttar Pradesh • 10 Apr 2026, 01:48 pm
इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा ने राष्ट्रपति को अपना इस्तीफा भेज दिया है। यह कदम ऐसे समय आया है जब उनके खिलाफ कैश बरामदगी और महाभियोग को लेकर विवाद लगातार बढ़ रहा था। जानकारी के मुताबिक 14 मार्च 2025 को दिल्ली स्थित उनके सरकारी आवास में आग लगने के दौरान 500-500 रुपये के नोटों के जले हुए बंडल मिले थे। इस घटना के बाद उन्हें दिल्ली हाईकोर्ट से स्थानांतरित कर इलाहाबाद हाईकोर्ट भेजा गया था। उन्होंने 5 अप्रैल 2025 को शपथ तो ले ली थी, लेकिन जांच पूरी होने तक उन्हें कोई न्यायिक जिम्मेदारी नहीं दी गई थी और न्यायिक कार्यों से दूर रखा गया था। उन्होंने 9 अप्रैल को इस्तीफा भेजा, जिसकी जानकारी 10 अप्रैल को सामने आई।
महाभियोग प्रस्ताव और सुप्रीम कोर्ट में चुनौती
कैश बरामदगी के बाद जस्टिस वर्मा के खिलाफ लोकसभा में महाभियोग प्रस्ताव लाया गया था। उन्होंने इस कार्रवाई को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की। उनका कहना था कि जब राज्यसभा में महाभियोग प्रस्ताव को मंजूरी नहीं मिली, तब लोकसभा द्वारा जांच समिति का गठन करना सही नहीं है। इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान कई अहम सवाल उठे। अदालत ने प्रक्रिया को लेकर कुछ खामियां भी बताईं, हालांकि यह भी कहा कि लोकसभा अध्यक्ष के पास जांच समिति बनाने का अधिकार होता है। इस पूरे मामले ने न्यायिक और संसदीय प्रक्रियाओं को लेकर नई बहस छेड़ दी है।
जांच पैनल पर सवाल और कोर्ट की टिप्पणियां
7 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने संसदीय जांच पैनल में कुछ खामियां होने की बात कही थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि जज जांच कानून के तहत लोकसभा अध्यक्ष को यह अधिकार है कि वह भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के लिए समिति गठित कर सकते हैं, भले ही राज्यसभा में प्रस्ताव खारिज हो चुका हो। इसके बाद 8 जनवरी को अदालत ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। हालांकि अदालत ने जस्टिस वर्मा को संसदीय समिति के सामने जवाब दाखिल करने की समय सीमा बढ़ाने से इनकार कर दिया था।
लोकसभा अध्यक्ष को नोटिस, संवैधानिक बहस तेज
इससे पहले 16 दिसंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला को नोटिस जारी किया था। अदालत ने पूछा था कि जब राज्यसभा में प्रस्ताव खारिज हो गया था, तब लोकसभा में समिति कैसे गठित की गई। इस मामले ने संसद की कार्यप्रणाली और कानूनी प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए। याचिका में यह भी दावा किया गया कि जांच पैनल संविधान के प्रावधानों का उल्लंघन करता है और इसे रद्द किया जाना चाहिए।
आगे की कार्रवाई पर टिकी नजर
जस्टिस वर्मा के इस्तीफे के बाद अब यह देखना अहम होगा कि महाभियोग की प्रक्रिया पर क्या असर पड़ता है। सामान्य तौर पर इस्तीफे के बाद महाभियोग की प्रक्रिया समाप्त हो जाती है, लेकिन मामले की गंभीरता को देखते हुए जांच जारी रह सकती है। इससे पहले तीन हाईकोर्ट जजों की जांच में उन्हें दोषी पाया गया था और उन्हें हटाने की सिफारिश की गई थी। इसके बाद सरकार ने संसद में महाभियोग प्रस्ताव रखा, जिसे 146 सांसदों के समर्थन के साथ मंजूरी मिली थी। यह पूरा मामला न्यायपालिका की पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर अहम सवाल खड़े कर रहा है।