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Shiv Vishwakarma |
Hindi Now Uttar Pradesh • 26 Dec 2025, 12:23 pm
आगरा में आबकारी अधिनियम और धोखाधड़ी से जुड़े करीब दस साल पुराने मामले में पुलिस और आबकारी विभाग की गंभीर कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो गए हैं। वर्ष 2015 में नूरी गेट क्षेत्र स्थित एक बीयर की दुकान से 1152 बीयर कैन बरामद करने के दावे के बावजूद अदालत में ठोस सबूत पेश नहीं किए जा सके। इसी का नतीजा रहा कि अदालत ने सभी आरोपियों को बरी कर दिया। मामला थाना एमएम गेट में दर्ज हुआ था और इसे लेकर लंबे समय तक कानूनी प्रक्रिया चली, लेकिन अंत में अभियोजन पक्ष की कमजोरी उजागर हो गई।
8 सितंबर 2015 को आबकारी निरीक्षक सुरेश कुमार को मुखबिर से सूचना मिली थी कि नूरी दरवाजा स्थित दुकान से बिना यूपी आबकारी होलोग्राम लगी बीयर की अवैध बिक्री हो रही है। सूचना के आधार पर पुलिस और आबकारी विभाग की संयुक्त टीम ने छापा मारने का दावा किया था। टीम ने मौके से 1152 बीयर कैन बरामद करने और नकली होलोग्राम मिलने की बात कही थी। इस दौरान कई लोगों को हिरासत में लेकर उनके खिलाफ आबकारी अधिनियम और धोखाधड़ी की धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया था।
अदालत में पेश नहीं हो सके अहम सबूत
मामले की सुनवाई के दौरान सबसे बड़ी चूक यह रही कि अभियोजन पक्ष 1152 बीयर कैन को अदालत में पेश ही नहीं कर सका। पुलिस द्वारा मालखाना रजिस्टर भी प्रस्तुत नहीं किया गया, जिससे बरामदगी के दावे पर संदेह गहरा गया। गवाहों की सूची में पुलिस और आबकारी विभाग के कई अधिकारियों के नाम होने के बावजूद केवल तीन गवाहों की गवाही दर्ज हो सकी। इन गवाहों के बयानों में भी आपसी विरोधाभास देखने को मिला, जिससे अभियोजन की कहानी कमजोर पड़ गई।इसके अलावा छापा मारने वाले पुलिसकर्मियों ने अदालत में आरोपियों की पहचान करने से भी इनकार कर दिया। इससे अभियोजन पक्ष का मामला और कमजोर हो गया। आबकारी विभाग यह भी स्पष्ट नहीं कर सका कि संबंधित दुकान का ठेका आखिर किसके नाम पर था, जबकि यह तथ्य मामले की रीढ़ माना जा रहा था।
लापरवाही पर उठे सवाल, आरोपियों को राहत
मामले में शुरुआत में सत्यपाल सिंह, धर्मेंद्र सिंह, नरेश शर्मा, कुशलपाल, दानवीर, जमील और रंजीत को आरोपी बनाया गया था। बाद में पत्रावली अलग होने के बाद कुशलपाल पुत्र हीरा सिंह निवासी मलपुरा और दानवीर पुत्र डालचंद निवासी सिंगाइच थाना जगनेर का विचारण किया गया। सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष के अधिवक्ता प्रकाश नारायण शर्मा और जय नारायण शर्मा ने अभियोजन की खामियों को प्रभावी ढंग से अदालत के सामने रखा। सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद एडीजे-21 विराट कुमार श्रीवास्तव ने स्पष्ट किया कि पुलिस और आबकारी विभाग साक्ष्य प्रस्तुत करने में पूरी तरह विफल रहा है। साक्ष्यों के अभाव और विभागीय लापरवाही को आधार बनाते हुए अदालत ने आरोपियों को बरी करने के आदेश दे दिए। इस फैसले के बाद पुलिस और आबकारी विभाग की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
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