कानपुर में डीएम ने दो बाबुओं को बनाया चपरासी, नहीं पास कर पाए टाइपिंग टेस्ट, दो साल पहले मिली थी मृतक आश्रित कोटे से नौकरी

Curated By: shivup | Hindi Now Uttar Pradesh • 08 Apr 2026, 02:25 pm
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कानपुर में तीन बाबुओं को टाइपिंग टेस्ट में लगातार फेल होने पर चपरासी बना दिया गया है। डीएम जितेंद्र प्रताप सिंह ने कार्रवाई करते हुए पदावनत किया। दो बार मौका मिलने के बाद भी 25 शब्द प्रति मिनट की शर्त पूरी नहीं करने पर यह फैसला लिया गया।

कानपुर कलेक्ट्रेट में कामकाज की गुणवत्ता को लेकर बड़ी कार्रवाई सामने आई है। यहां तीन बाबुओं को टाइपिंग टेस्ट में लगातार फेल होने पर डिमोशन कर चपरासी बना दिया गया है। यह कार्रवाई जिलाधिकारी Jitendra Pratap Singh के निर्देश पर की गई है। जानकारी के मुताबिक, इन कर्मचारियों को 2023 में मृतक आश्रित कोटे से नौकरी मिली थी, लेकिन तय नियमों के तहत एक मिनट में 25 शब्द टाइप करने की अनिवार्यता पूरी नहीं कर सके। इसके चलते प्रशासन ने सख्त कदम उठाया है, जिससे विभागों में हलचल मच गई है।


दो बार फेल होने के बाद लिया गया फैसला

प्रेमनाथ यादव, अमित कुमार यादव और नेहा श्रीवास्तव को 2023 में नौकरी मिलने के बाद 2024 में पहला टाइपिंग टेस्ट देना था, लेकिन वे उसमें असफल रहे। उस समय प्रशासन ने उन्हें सुधार का मौका देते हुए वेतन वृद्धि रोक दी थी। इसके बाद 2025 में दोबारा टेस्ट आयोजित किया गया, लेकिन इस बार भी तीनों कर्मचारी एक मिनट में 25 शब्द टाइप नहीं कर पाए। लगातार दूसरी बार असफल होने के बाद मामले की समीक्षा की गई और अंततः उन्हें जूनियर क्लर्क के पद से हटाकर चतुर्थ श्रेणी में भेजने का निर्णय लिया गया।


डीएम बोले- जरूरी है बुनियादी कौशल

डीएम जितेंद्र प्रताप सिंह ने कहा कि कलेक्ट्रेट जैसे दफ्तरों में टाइपिंग कौशल बेहद जरूरी होता है। फाइलों की नोटिंग और दस्तावेज तैयार करने के लिए यह एक बुनियादी आवश्यकता है। ऐसे में जो कर्मचारी निर्धारित मानकों को पूरा नहीं कर पाते, उनके खिलाफ कार्रवाई करना जरूरी हो जाता है। आदेश लागू होते ही तीनों कर्मचारियों का पद घटा दिया गया और अब वे चपरासी के रूप में काम करेंगे। साथ ही उनकी वेतन वृद्धि भी रोक दी गई है।


कर्मचारियों में चर्चा, फैसले पर मिली-जुली प्रतिक्रिया

इस कार्रवाई के बाद कलेक्ट्रेट और अन्य विभागों में चर्चा तेज हो गई है। कुछ लोग इसे प्रशासनिक सुधार की दिशा में जरूरी कदम मान रहे हैं, जिससे कामकाज की गुणवत्ता बेहतर होगी। वहीं कुछ कर्मचारियों का मानना है कि कार्रवाई से पहले उन्हें और समय या प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए था। फिलहाल इस फैसले से यह साफ संकेत मिल गया है कि अब कार्यकुशलता को लेकर प्रशासन और सख्त रुख अपनाने जा रहा है।

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