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Shiv Vishwakarma |
Hindi Now Uttar Pradesh • 30 Nov 2025, 12:24 pm
सहारनपुर के जमीयत उलेमा-ए-हिंद के प्रमुख मौलाना महमूद मदनी ने ‘जिहाद’ शब्द को लेकर उठ रहे सवालों पर कड़ी आपत्ति जताई है। भोपाल में आयोजित जमीयत की नेशनल गवर्निंग बॉडी की बैठक में उन्होंने कहा कि इस्लाम और मुसलमानों के विरोधियों ने जिहाद जैसे पवित्र विचार को गलत अर्थ देकर उसे हिंसा और अतिवाद से जोड़ दिया है। उन्होंने कहा कि ‘लव जिहाद’, ‘लैंड जिहाद’, ‘एजुकेशन जिहाद’ और ‘थूक जिहाद’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल करके मुसलमानों को बदनाम किया जाता है और उनके धर्म का अपमान किया जाता है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार और मीडिया में जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग भी ऐसे शब्दों का प्रयोग करते हैं, जिन्हें न शर्म है और न ही मुस्लिम समुदाय को होने वाली पीड़ा की परवाह है।
जब-जब जुल्म होगा, तब-तब जिहाद होगा
बैठक के दौरान मौलाना मदनी ने विवादित टिप्पणी भी की। उन्होंने कहा कि जब-जब जुल्म होगा, तब-तब जिहाद होगा। उन्होंने देश के मौजूदा हालात को बेहद संवेदनशील और चिंताजनक बताया। उन्होंने कहा कि एक समुदाय को कानूनी रूप से कमजोर करने, सामाजिक रूप से अलग-थलग करने और आर्थिक रूप से बेदखल करने की कोशिशें हो रही हैं। उन्होंने कहा कि मॉब लिंचिंग, बुलडोजर कार्रवाई, वक्फ प्रॉपर्टी पर कब्जा और मदरसों के खिलाफ नकारात्मक अभियान जैसे कदम मुसलमानों की पहचान और वजूद को कमजोर करने की कोशिश का हिस्सा हैं। उन्होंने दावा किया कि आज मुसलमान अपने ही देश में असुरक्षित महसूस करते हैं और उन्हें कदम-कदम पर नफरत का सामना करना पड़ता है, इसलिए अब उन्हें तैयार रहना होगा।
मौलाना मदनी ने न्यायपालिका पर उठाए सवाल
मौलाना मदनी ने ‘घर वापसी’ अभियानों पर भी सवाल उठाए और कहा कि किसी खास धर्म में लोगों को शामिल करने वालों को खुली छूट मिली हुई है। न उनके खिलाफ सवाल उठते हैं और न ही कानूनी कार्रवाई होती है। यह सरकार का दोहरा रवैया है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों पर भी गंभीर सवाल खड़े किए। मौलाना ने कहा कि न्याय के बिना देश में शांति और अपराध मुक्त समाज की कल्पना अधूरी है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में बाबरी मस्जिद, ट्रिपल तलाक और ऐसे कई मामलों के फैसलों ने यह धारणा बढ़ाई है कि अदालतें सरकार के दबाव में काम कर रही हैं। उन्होंने कहा कि अल्पसंख्यकों से जुड़े संवैधानिक नियमों की कई व्याख्याओं ने न्यायपालिका की भूमिका पर संदेह पैदा किया है। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट तभी ‘सुप्रीम’ कहलाने का अधिकारी है, जब वह संविधान की पाबंदी करे और कानून के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाए, अन्यथा वह नैतिक रूप से यह दर्जा खो देता है।
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