पहलगाम आतंकी हमले की आज पहली बरसी, ऐशान्या बोलीं- जब तक आतंकवाद जिंदा, इंसाफ अधूरा

Curated By: shivup | Hindi Now Uttar Pradesh • 22 Apr 2026, 12:36 pm
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पहलगाम आतंकी हमले को एक साल पूरा होने पर कानपुर के शुभम द्विवेदी की पत्नी ऐशान्या ने अपना दर्द साझा किया। उन्होंने कहा कि अब जिंदगी में सिर्फ यादें बची हैं और न्याय की उम्मीद ही सहारा है।

जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले को आज एक साल पूरा हो गया, लेकिन उस दिन का दर्द अब भी जिंदा है। 22 अप्रैल को हुए इस हमले में 26 लोगों की जान गई थी, जिनमें कानपुर के 30 वर्षीय शुभम द्विवेदी भी शामिल थे। उनकी पत्नी ऐशान्या के सामने ही आतंकियों ने नाम और मजहब पूछकर उन्हें गोली मार दी थी। शादी को सिर्फ दो महीने हुए थे और जिंदगी की शुरुआत ही हुई थी, लेकिन एक पल में सब खत्म हो गया। एक साल बाद भी ऐशान्या उस दिन को याद कर भावुक हो जाती हैं। उनका कहना है कि अब उनकी जिंदगी में सिर्फ यादें ही बची हैं और न्याय की उम्मीद बाकी है।


“हर दिन वही यादें, न त्योहार न सालगिरह”

ऐशान्या बताती हैं कि हमले के बाद से उनकी जिंदगी पूरी तरह बदल गई है। न कोई त्योहार मनाने का मन करता है और न ही शादी की सालगिरह की कोई खुशी बची है। वह कहती हैं कि जब भी कोई खास दिन आता है, तो शुभम की याद और गहरी हो जाती है। 17 अप्रैल को जब वे घूमने निकले थे, उन पलों को याद कर आज भी उनकी आंखें भर आती हैं। वह कहती हैं कि उन तस्वीरों को देखकर लगता है कि हम कितने खुश थे, लेकिन 22 अप्रैल ने सब कुछ छीन लिया। अब हर खुशी अधूरी लगती है और हर दिन एक खालीपन के साथ गुजरता है।


परिवार बना सहारा, लेकिन दर्द कायम

ऐशान्या कहती हैं कि इस मुश्किल वक्त में परिवार ही उनकी सबसे बड़ी ताकत बना। सास-ससुर और उनके अपने माता-पिता ने हर कदम पर उनका साथ दिया। इसी सहारे उन्होंने खुद को संभालने की कोशिश की। शुभम के पिता संजय द्विवेदी भी बेटे को याद कर भावुक हो जाते हैं। उन्होंने अपने ऑफिस में बेटे की तस्वीर लगा रखी है और हर दिन उसे देखकर ही काम शुरू करते हैं। हर महीने गांव में शुभम के नाम से भोज भी कराया जाता है, ताकि उनकी यादें जिंदा रहें। परिवार का कहना है कि इस दर्द से उबरना आसान नहीं है, लेकिन एक-दूसरे के साथ से ही हिम्मत मिल रही है।


न्याय की उम्मीद और आतंकवाद के खिलाफ आवाज

ऐशान्या का कहना है कि उन्हें पूरी राहत तभी मिलेगी जब आतंकवाद पूरी तरह खत्म होगा। वह मानती हैं कि कुछ सैन्य कार्रवाइयों से संतोष जरूर मिला है, लेकिन असली सुकून तब मिलेगा जब ऐसे हमले पूरी तरह बंद हो जाएंगे। उन्होंने यह भी कहा कि यह दर्द जिंदगी भर साथ रहेगा और इसे भूल पाना संभव नहीं है। वहीं, परिवार ने सरकार से मांग की है कि इस हमले में जान गंवाने वालों को शहीद का दर्जा दिया जाए। 22 अप्रैल को कानपुर में शुभम को श्रद्धांजलि देने के लिए कार्यक्रम भी आयोजित किया जा रहा है, जहां लोग उन्हें याद कर श्रद्धांजलि देंगे।


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