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shivup |
Hindi Now Uttar Pradesh • 18 Apr 2026, 11:51 am
नई दिल्ली में शुक्रवार का दिन भारतीय राजनीति के लिए अहम मोड़ लेकर आया, जब महिला आरक्षण बिल (131वां संविधान संशोधन) लोकसभा में पास नहीं हो सका। सरकार इस बिल को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नजर आ रही थी, लेकिन वोटिंग के समय जरूरी आंकड़े तक नहीं पहुंच पाई। सदन में बिल के पक्ष में 298 वोट पड़े, जबकि 230 सांसदों ने इसके खिलाफ मतदान किया। संविधान संशोधन के लिए दो-तिहाई बहुमत जरूरी होता है, जो इस बार नहीं मिल सका। पिछले 12 सालों में यह पहला मौका है जब केंद्र सरकार का कोई संविधान संशोधन बिल लोकसभा में गिरा है। दो दिन तक चली लंबी बहस, प्रधानमंत्री की अपील और लगातार राजनीतिक बयानबाजी के बावजूद यह बिल पास नहीं हो पाया, जिससे अब इस मुद्दे पर नई बहस शुरू हो गई है।
लोकसभा में क्यों गिरा संविधान संशोधन विधेयक? 5 प्रमुख कारण
इस बिल के गिरने के पीछे कई कारण रहे, जिनमें सबसे अहम दो-तिहाई बहुमत का आंकड़ा पूरा न होना था। वोटिंग के समय 528 सदस्य मौजूद थे और बिल पास कराने के लिए 352 वोट जरूरी थे, लेकिन सरकार को केवल 298 वोट ही मिल सके। इसके अलावा परिसीमन और जनगणना को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया। दक्षिण भारत के राज्यों को अपने प्रतिनिधित्व में कमी का डर था। विपक्ष ने मजबूत रणनीति के साथ एकजुट होकर सरकार का मुकाबला किया। वहीं सरकार का अपने नंबर गेम पर ज्यादा भरोसा भी भारी पड़ गया, जिससे अंत में बिल पास नहीं हो पाया।
परिसीमन और जनगणना पर विवाद बना बड़ा कारण
इस बिल को लेकर सबसे बड़ा विवाद परिसीमन और जनगणना की शर्त को लेकर हुआ। विपक्ष का कहना था कि सरकार महिला आरक्षण को तुरंत लागू करने के बजाय इसे भविष्य की प्रक्रिया से जोड़ रही है। उनका आरोप था कि यह कदम राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है। विपक्ष चाहता था कि मौजूदा सीटों पर ही आरक्षण लागू किया जाए, ताकि महिलाओं को तुरंत लाभ मिल सके। यही मुद्दा बहस का केंद्र बना और कई दलों ने इसी आधार पर बिल का विरोध किया।
दक्षिण राज्यों में प्रतिनिधित्व घटने की आशंका
दक्षिण भारतीय राज्यों को इस बात का डर था कि परिसीमन के बाद सीटों की संख्या बढ़ने से उत्तर भारत को ज्यादा फायदा होगा और उनका राजनीतिक प्रभाव कम हो सकता है। इन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है, लेकिन नई व्यवस्था में उन्हें नुकसान होने की आशंका है। इस वजह से कई क्षेत्रीय दल इस बिल के खिलाफ खड़े हो गए और विपक्ष को मजबूती मिली।
विपक्ष की एकजुट रणनीति ने बदला समीकरण
इस बार विपक्ष ने बेहद संगठित रणनीति अपनाई। मल्लिकार्जुन खरगे, अखिलेश यादव और ममता बनर्जी जैसे नेताओं ने मिलकर सरकार को घेरने की योजना बनाई। सभी दलों ने एक सुर में बिल का विरोध किया और इसे चुनावी नक्शा बदलने की कोशिश बताया। इस एकजुटता ने सरकार के गणित को बिगाड़ दिया।
सरकार की रणनीति और नंबर गेम की चूक
सरकार को उम्मीद थी कि वह कुछ छोटे दलों और निर्दलीय सांसदों का समर्थन हासिल कर लेगी, लेकिन ऐसा नहीं हो सका। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की अपीलों का भी ज्यादा असर नहीं पड़ा। अंत में सरकार जरूरी 360 वोटों का आंकड़ा नहीं जुटा पाई, जिससे बिल गिर गया।
महिला आरक्षण पर सियासी टकराव तेज
बिल गिरने के बाद राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने इसे लोकतंत्र की जीत बताया, जबकि सरकार ने विपक्ष पर महिला विरोधी होने का आरोप लगाया। दोनों पक्षों के बीच इस मुद्दे पर तीखी बहस जारी है, जिससे साफ है कि यह मुद्दा आने वाले समय में भी राजनीति के केंद्र में बना रहेगा।
आगे क्या होगा महिला आरक्षण का भविष्य?
अब सवाल उठता है कि इस बिल का भविष्य क्या होगा। चूंकि यह संविधान संशोधन से जुड़ा मामला है, इसलिए सरकार को इसे दोबारा लाने के लिए नई रणनीति बनानी होगी। विपक्ष के साथ सहमति बनाना भी जरूरी होगा। फिलहाल इतना तय है कि बिना व्यापक समर्थन के इस तरह के बड़े बदलाव संभव नहीं हैं और इस मुद्दे पर आगे भी राजनीतिक संघर्ष जारी रहेगा।