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shivup |
Hindi Now Uttar Pradesh • 10 Mar 2026, 02:59 pm
देश में समान नागरिक संहिता यानी यूनिफॉर्म सिविल कोड को लेकर बहस समय-समय पर सामने आती रही है। अब एक बार फिर यह मुद्दा चर्चा में आ गया है। दरअसल सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका पर सुनवाई के दौरान अदालत की टिप्पणी के बाद इस विषय पर नई बहस शुरू हो गई है। सुप्रीम कोर्ट में जिस याचिका पर सुनवाई हो रही थी, उसमें 1937 के मुस्लिम पर्सनल लॉ यानी शरीयत कानून की कुछ धाराओं को चुनौती दी गई है। याचिका में कहा गया कि इन नियमों के कारण मुस्लिम महिलाओं को संपत्ति के मामले में बराबरी का अधिकार नहीं मिल पाता। याचिकाकर्ता का तर्क था कि महिलाओं को उत्तराधिकार के मामले में पुरुषों के बराबर अधिकार मिलना चाहिए और इसके लिए कानून में बदलाव जरूरी है। इसी मुद्दे पर अदालत में विस्तृत सुनवाई हुई।
कोर्ट ने क्या कहा
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह एक गंभीर और संवेदनशील विषय है, जिस पर सोच-समझकर निर्णय लिया जाना चाहिए। अदालत ने यह भी कहा कि अगर किसी कानून को खत्म किया जाता है तो यह देखना जरूरी है कि उसकी जगह कौन सा कानून लागू होगा। कोर्ट के अनुसार यदि 1937 के मुस्लिम पर्सनल लॉ से जुड़े कुछ प्रावधानों को हटा दिया जाए और उनकी जगह कोई स्पष्ट कानून न हो, तो इससे कानूनी खालीपन पैदा हो सकता है। इसलिए किसी भी बदलाव से पहले उसके सभी पहलुओं पर विचार जरूरी है।
जल्दबाजी में फैसला ठीक नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि सामाजिक और कानूनी सुधारों को जल्दबाजी में लागू करना सही नहीं होता। अदालत के अनुसार अगर बिना पूरी तैयारी के कोई बदलाव किया गया और उसके परिणामस्वरूप महिलाओं को पहले से कम अधिकार मिल गए तो यह और बड़ी समस्या बन सकती है। इसलिए अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में संतुलित और व्यापक सोच के साथ कदम उठाया जाना चाहिए।
संसद की भूमिका अहम
सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि समान नागरिक संहिता जैसे बड़े विषयों पर अंतिम फैसला अदालत के बजाय संसद को करना चाहिए। संविधान के अनुसार कानून बनाने की जिम्मेदारी विधायिका यानी संसद की होती है। कोर्ट ने कहा कि समाज से जुड़े बड़े बदलावों के लिए विधायी प्रक्रिया सबसे उपयुक्त रास्ता होती है। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने दलील दी कि अदालत यह घोषणा कर सकती है कि मुस्लिम महिलाओं को भी पुरुषों के बराबर उत्तराधिकार का अधिकार मिलना चाहिए। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि अगर शरीयत कानून की विवादित धाराओं को हटाया जाता है तो ऐसे मामलों में भारतीय उत्तराधिकार कानून लागू किया जा सकता है। हालांकि अदालत ने इस पर कोई अंतिम फैसला नहीं दिया।
UCC पर फिर शुरू हुई बहस
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद देश में समान नागरिक संहिता को लेकर एक बार फिर चर्चा तेज हो गई है। अदालत ने संकेत दिया है कि यह विषय महत्वपूर्ण है और इस पर विचार किया जाना चाहिए, लेकिन अंतिम निर्णय संसद को ही लेना होगा। अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि आने वाले समय में सरकार और संसद इस दिशा में क्या कदम उठाते हैं। कई विशेषज्ञों का मानना है कि यह मुद्दा आने वाले समय में राजनीतिक और सामाजिक बहस का एक बड़ा विषय बना रह सकता है। - सह-संपादक आशीष शुक्ला की रिपोर्ट।
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