8 मार्च को दिल्ली में बड़ा प्रदर्शन, UGC नियमों के खिलाफ सवर्ण संगठनों का हल्लाबोल!

Curated By: shivup | Hindi Now Uttar Pradesh • 06 Mar 2026, 03:49 pm
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देश में UGC के नए इक्विटी रेगुलेशंस को लेकर विवाद लगातार गहराता जा रहा है। अब यह मुद्दा सोशल मीडिया से निकलकर सड़कों तक पहुंच चुका है।

8 मार्च को दिल्ली के रामलीला मैदान में सवर्ण समाज के कई संगठन बड़ा प्रदर्शन करने की तैयारी में हैं। इस आंदोलन को लेकर राजधानी में हलचल तेज हो गई है और इसे सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती माना जा रहा है। दरअसल, विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में जाति आधारित भेदभाव को रोकने के उद्देश्य से UGC ने नए इक्विटी नियम लागू किए थे। इन नियमों का मकसद खास तौर पर SC, ST और OBC वर्ग के छात्रों की सुरक्षा सुनिश्चित करना बताया गया था। लेकिन जनरल कैटेगरी या सवर्ण समाज के कई संगठनों ने इन नियमों को एकतरफा बताते हुए विरोध शुरू कर दिया। उनका कहना है कि नियमों में भेदभाव की परिभाषा केवल SC/ST/OBC के खिलाफ होने वाले भेदभाव को ही कवर करती है, जबकि सामान्य वर्ग के छात्रों को इसमें शामिल नहीं किया गया। विरोध बढ़ने के बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा और जनवरी में कोर्ट ने इन नियमों पर अस्थायी रोक भी लगा दी। हालांकि, कोर्ट के स्टे के बावजूद सवर्ण समाज के संगठनों का गुस्सा शांत नहीं हुआ है। इसी के चलते 8 मार्च को दिल्ली में बड़े प्रदर्शन की तैयारी की जा रही है।


कई संगठन एक मंच पर

बताया जा रहा है कि इस आंदोलन में सवर्ण आर्मी, क्षत्रिय करणी सेना, चाणक्य परिषद और सवर्ण समाज समन्वय समिति जैसे कई संगठन शामिल हो रहे हैं। आयोजकों का दावा है कि देश के अलग-अलग राज्यों से हजारों लोग दिल्ली पहुंचेंगे और रामलीला मैदान में अपनी आवाज उठाएंगे। इन संगठनों का कहना है कि उनकी मांग सिर्फ UGC के नए नियमों को वापस लेने तक सीमित नहीं है। वे यह भी चाहते हैं कि कानून सभी वर्गों के लिए समान रूप से लागू हो और किसी भी समुदाय के खिलाफ होने वाली नफरत या हिंसा पर एक जैसी सख्ती हो।


आंदोलन की प्रमुख मांगें

प्रदर्शन की तैयारी के बीच सवर्ण संगठनों ने अपनी कई मांगें भी सामने रखी हैं। पहली मांग यह है कि अगर SC/ST एक्ट में दलित और आदिवासी समुदाय के खिलाफ नफरत फैलाने या हिंसा को अपराध माना गया है, तो सवर्ण समाज के खिलाफ होने वाली घृणास्पद बयानबाजी या हिंसा को भी कानूनन अपराध बनाया जाए। दूसरी मांग यह है कि सरकार सामान्य वर्ग के लोगों के खिलाफ होने वाली हिंसा या भेदभाव के मामलों में भी उतनी ही गंभीरता से कार्रवाई करे, जितनी अन्य वर्गों के मामलों में होती है। कई छात्रों का दावा है कि विश्वविद्यालय परिसरों में उनके साथ भी जाति आधारित अपमान की घटनाएं होती हैं, लेकिन उन्हें पर्याप्त कानूनी सुरक्षा नहीं मिलती। तीसरी मांग UGC के इक्विटी नियमों से जुड़ी है। प्रदर्शनकारी संगठनों का कहना है कि इक्विटी कमिटी में केवल SC, ST और OBC प्रतिनिधियों को जगह दी गई, जबकि जनरल कैटेगरी के छात्रों को इसमें शामिल नहीं किया गया। उनका तर्क है कि इससे नियमों में असंतुलन दिखाई देता है। इसके अलावा यह भी मांग उठाई जा रही है कि किसी भी समुदाय के खिलाफ सार्वजनिक मंचों, नारों, पोस्टरों या सोशल मीडिया पर नफरत फैलाने वालों पर समान रूप से कार्रवाई होनी चाहिए।


सरकार के सामने नई चुनौती

राजनीतिक हलकों में भी इस मुद्दे पर चर्चा तेज हो गई है। कुछ जगहों पर बीजेपी से जुड़े कुछ कार्यकर्ताओं के इस्तीफे की खबरें भी सामने आई हैं, जिससे यह संकेत मिलता है कि मामला राजनीतिक रूप भी ले सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह विवाद केवल एक नियम या बिल तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश में समान अधिकार और सामाजिक न्याय की बहस से भी जुड़ा हुआ है। सवर्ण संगठनों का कहना है कि संविधान सभी नागरिकों को बराबरी का अधिकार देता है, इसलिए कानून भी सभी के लिए समान होना चाहिए।


8 मार्च पर टिकी नजर

अब सभी की नजर 8 मार्च पर टिकी है, जब दिल्ली के रामलीला मैदान में यह बड़ा प्रदर्शन होने वाला है। देखना होगा कि क्या सरकार इस मुद्दे पर कोई नया कदम उठाती है, क्या UGC नियमों में बदलाव किया जाएगा या यह आंदोलन देश में एक नई बहस को जन्म देगा। फिलहाल इतना तय है कि UGC नियमों को लेकर शुरू हुआ विवाद आने वाले दिनों में और राजनीतिक व सामाजिक चर्चा का केंद्र बन सकता है। - आशीष शुक्ला, सह-संपादक की रिपोर्ट।


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