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shivup |
Hindi Now Uttar Pradesh • 06 Mar 2026, 05:47 pm
ईरान इन दिनों अपनी सबसे मुश्किल स्थिति से गुजर रहा है। अमेरिका और इजरायल के मिलकर शुरू किए गए संघर्ष ने देश की सांसें रोक दी हैं, लेकिन सबसे बड़ा झटका उसे उसके खुद के मित्रों से लगा है। रूस और चीन, जिनसे ईरान को समर्थन की उम्मीद थी, अब धीरे-धीरे दूरी बना रहे हैं।
रूस का रणनीतिक कदम
रूस ने चुपचाप खाड़ी देशों से संबंध मजबूत किए हैं। सऊदी अरब और यूएई के साथ तेल डील बढ़ा दी गई, जबकि ईरान पर अमेरिका के निशाने के खिलाफ केवल जुबानी निंदा की गई। रूस ने साफ संकेत दिया है कि वह ईरान को सैन्य मदद नहीं देगा। 2025 में रूस और ईरान के बीच रणनीतिक साझेदारी स्थापित हुई थी और पुतिन ने खुद कहा था कि वे ईरान के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हैं। लेकिन अब स्थिति बदल गई है। रूस खुद यूक्रेन युद्ध में उलझा है और अमेरिका के साथ नया टकराव नहीं चाहता। यही वजह है कि उसने खाड़ी देशों से हाथ मिलाकर अपने आर्थिक और रणनीतिक हितों को मजबूत करने का रास्ता चुना।
चीन का अलग रुख
केवल रूस ही नहीं, चीन ने भी दूरी बनाई है। चीन ईरान का सबसे बड़ा तेल खरीदार रहा है, लेकिन उसने सैन्य या रणनीतिक मदद देने से इनकार कर दिया। चीन की नई विदेश नीति और खाड़ी देशों के साथ गहरे आर्थिक संबंधों ने उसे मजबूर किया कि ईरान के साथ खुला साथ न दे। इसके पीछे यह भी सोच है कि अगर चीन ईरान के पक्ष में जाता है, तो अमेरिका के साथ संबंधों में तनाव बढ़ सकता है। यही कारण है कि चीन ने केवल कूटनीतिक बयान दिए, वास्तविक मदद नहीं की।
ईरान अकेला पड़ गया
ईरान अब अकेले पड़ता जा रहा है। पहले वह शिया बहुल देशों के समर्थन पर भरोसा करता था – इराक, अज़रबैजान, लेबनान, बहरीन और यमन। लेकिन ये देश पहले से ही अपनी लड़ाई में उलझे हैं और ईरान के समर्थन के लिए तैयार नहीं हैं। इसके अलावा, अधिकांश मुस्लिम देशों में सुन्नी बहुलता है, सऊदी अरब, तुर्की, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश और इंडोनेशिया – ये भी ईरान के खुलकर साथ देने से दूरी बना रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि रूस और चीन की यह दूरी और खाड़ी देशों के साथ उसका गठबंधन ईरान के लिए नई आफत साबित हो सकता है। ईरान का कूटनीतिक और आर्थिक समर्थन घट रहा है, जबकि अमेरिका और इजरायल सक्रिय रूप से उसकी ऊर्जा और सुरक्षा लाइन पर दबाव बना रहे हैं।
रणनीतिक मायने
रूस ने इस कदम से स्पष्ट संदेश दिया है कि वह वैश्विक तेल बाजार में अपनी स्थिति मजबूत करना चाहता है। खाड़ी देशों से हाथ मिलाकर रूस ने अपने तेल व्यापार को सुरक्षित किया और ईरान को बायपास किया। तुर्की और कतर ने मध्यस्थता की पेशकश की, लेकिन सैन्य मदद नहीं दी। इससे साफ है कि ईरान अब अकेला पड़ चुका है और उसके दोस्त उसका साथ छोड़ रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति ईरान के लिए गंभीर संकट है। वह अब अपने पूर्ववर्ती मित्रों और सहयोगियों से मदद की उम्मीद नहीं कर सकता। जबकि अमेरिका, इजरायल और उनके समर्थक इस मौक़े का पूरा लाभ उठा रहे हैं।
निष्कर्ष
ईरान को अब यह समझना होगा कि उसके पास अंतरराष्ट्रीय सहयोग की कमी है और अकेले कदम उठाने के लिए तैयार रहना होगा। रूस और चीन की दूरी, खाड़ी देशों के गठबंधन और अमेरिका-इजरायल का दबाव मिलकर ईरान को नई चुनौती में डाल रहे हैं। यह घटनाक्रम दिखाता है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में दोस्ती और सहयोग कितनी जल्दी बदल सकते हैं। ईरान के लिए अब एकमात्र विकल्प यह है कि वह रणनीतिक समझौते, कूटनीतिक वार्ता और अपनी आंतरिक तैयारियों पर ध्यान दे। अगर वह सही कदम नहीं उठाता है, तो उसका सामरिक और आर्थिक नुकसान बढ़ सकता है। इस तरह से रूस और चीन के अलग रुख ने ईरान को अकेला छोड़ दिया है और अमेरिकी-इजरायली रणनीति ने उसका संतुलन बिगाड़ दिया है। ईरान अब वैश्विक राजनीति में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए नई चाल चलने पर मजबूर है। -आशीष शुक्ला, सह-संपादक की रिपोर्ट।
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