हलफनामे में गलत जानकारी देना पड़ा भारी, सुप्रीम कोर्ट से भी भाजपा पार्षद को झटका

Curated By: shivup | Hindi Now Uttar Pradesh • 20 May 2026, 03:19 pm
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लखनऊ नगर निगम के वार्ड-73 में भाजपा पार्षद को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। हलफनामे में गलत जानकारी देने के मामले में कोर्ट ने निर्वाचन रद्द करने के फैसले को बरकरार रखा। अब सपा नेता ललित तिवारी को पार्षद पद की शपथ दिलाने का रास्ता साफ हो गया है।

लखनऊ नगर निगम के वार्ड-73 फैजुल्लागंज (तृतीय) से जुड़े पार्षद विवाद में भाजपा को बड़ा झटका लगा है। लखनऊ हाईकोर्ट के बाद अब सुप्रीम कोर्ट ने भी भाजपा पार्षद प्रदीप कुमार शुक्ला उर्फ टिंकू शुक्ला की याचिका खारिज कर दी है। इसके साथ ही समाजवादी पार्टी के नेता ललित तिवारी का पार्षद बनना लगभग तय हो गया है। कोर्ट ने पहले ही साफ कर दिया था कि नामांकन के दौरान शपथ पत्र में जरूरी जानकारी छिपाना और दस्तावेज न देना चुनावी धांधली की श्रेणी में आता है। इसी आधार पर भाजपा पार्षद का निर्वाचन रद्द किया गया था। अब सुप्रीम कोर्ट से राहत न मिलने के बाद नगर निगम प्रशासन पर ललित तिवारी को जल्द शपथ दिलाने का दबाव बढ़ गया है।


नामांकन में जानकारी छिपाने पर रद्द हुआ चुनाव

नगरीय निकाय चुनाव 2023 में भाजपा प्रत्याशी प्रदीप कुमार शुक्ला और सपा प्रत्याशी ललित तिवारी के बीच सीधी टक्कर हुई थी। मतगणना में प्रदीप शुक्ला को 4972 वोट मिले थे, जबकि ललित तिवारी को 3298 वोट प्राप्त हुए थे। इसके बाद भाजपा प्रत्याशी को विजयी घोषित कर दिया गया था। हालांकि चुनाव परिणाम आने के बाद ललित तिवारी ने अदालत का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा प्रत्याशी ने नामांकन के दौरान जरूरी जानकारियां और दस्तावेज शपथ पत्र में नहीं दिए। कोर्ट में सुनवाई के दौरान दस्तावेजों और रिकॉर्ड की जांच की गई। अदालत ने माना कि यह गंभीर अनियमितता है और इससे चुनाव की वैधता प्रभावित हुई है। इसी आधार पर निर्वाचन रद्द करते हुए ललित तिवारी को विजयी घोषित कर दिया गया।


हाईकोर्ट की सख्ती के बाद बढ़ा प्रशासन पर दबाव

निर्वाचन न्यायाधिकरण ने 19 दिसंबर 2025 को ही ललित तिवारी को निर्वाचित घोषित कर दिया था, लेकिन कई महीने बीतने के बाद भी उन्हें शपथ नहीं दिलाई गई। इस पर मामला हाईकोर्ट पहुंचा, जहां अदालत ने सख्त रुख अपनाया। कोर्ट ने कहा कि यदि तय समय में शपथ नहीं दिलाई गई तो लखनऊ की मेयर, जिलाधिकारी और नगर आयुक्त को व्यक्तिगत रूप से अदालत में पेश होना पड़ेगा। सुनवाई में यह भी सामने आया कि जिला प्रशासन और राज्य सरकार की ओर से नगर निगम को कार्रवाई के निर्देश पहले ही दिए जा चुके थे। अब सुप्रीम कोर्ट से भाजपा पार्षद की एसएलपी खारिज होने के बाद प्रशासनिक देरी पर सवाल और तेज हो गए हैं। राजनीतिक गलियारों में भी इस फैसले को लेकर चर्चाएं तेज हैं।


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