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shivnowup |
Hindi Now Uttar Pradesh • 15 Jan 2026, 01:05 pm
लखनऊ में एक युवक पर झूठा SC-ST और दुष्कर्म का मामला दर्ज कराने वाली महिला पर अब खुद कानूनी शिकंजा कसने जा रहा है। विशेष न्यायालय (SC/ST एक्ट) ने 14 साल पुराने मामले में आरोपी युवक को सभी आरोपों से बरी करते हुए शिकायतकर्ता महिला के खिलाफ दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 344 के तहत FIR दर्ज कराने के आदेश दिए हैं। अदालत ने साफ कहा कि महिला द्वारा पेश किए गए सभी साक्ष्य संदेह के घेरे में हैं और उसके बयान आपस में एक-दूसरे से मेल नहीं खाते।
14 साल बाद कोर्ट ने दिया न्याय
यह फैसला 12 जनवरी को विशेष न्यायालय (SC/ST एक्ट) के न्यायाधीश एवं अपर सत्र न्यायाधीश हुसैन अहमद अंसारी ने खुले न्यायालय में सुनाया। अदालत ने अभियुक्त विल्सन सिंह उर्फ आशु को भारतीय दंड संहिता की धारा 376 (बलात्कार), 506 (आपराधिक धमकी) और SC/ST एक्ट की धारा 3(1)(12) के तहत लगाए गए सभी आरोपों से बरी कर दिया। साथ ही, अभियुक्त के निजी मुचलके और जमानतनामे निरस्त करते हुए जमानतदारों को भी दायित्व से मुक्त कर दिया गया।
2011 में दर्ज हुआ था मामला
मामले की शुरुआत 9 अप्रैल 2011 को लखनऊ के विकास नगर थाने में हुई थी, जब शिकायतकर्ता महिला ने युवक पर गंभीर आरोप लगाते हुए मुकदमा दर्ज कराया था। इसके बाद यह मामला विशेष न्यायालय में चला और वर्षों तक सुनवाई होती रही। अभियोजन पक्ष की ओर से कई गवाह और दस्तावेज प्रस्तुत किए गए, लेकिन अदालत की नजर में ये साक्ष्य आरोप सिद्ध करने में नाकाम साबित हुए।
बयान और साक्ष्यों में गंभीर विरोधाभास
सुनवाई के दौरान अभियुक्त की ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ता गंधर्व गौड़ ने अदालत के सामने यह दलील दी कि शिकायतकर्ता के बयान अलग-अलग चरणों में एक-दूसरे के विपरीत हैं। जिरह के दौरान यह भी सामने आया कि मेडिकल रिपोर्ट और अन्य दस्तावेजी साक्ष्य अभियोजन के कथन का पूर्ण समर्थन नहीं करते। न्यायालय ने अपने आदेश में इन विरोधाभासों को गंभीर माना और कहा कि आपराधिक मामलों में दोषसिद्धि के लिए आरोपों का संदेह से परे सिद्ध होना जरूरी है, जो इस मामले में नहीं हो सका।
शिकायतकर्ता पर FIR के आदेश
अदालत ने अपने फैसले में एक अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष की गवाह पीडब्ल्यू-2 सोनी कनौजिया द्वारा दिए गए बयान मिथ्या और विरोधाभासी पाए गए हैं। इसी आधार पर न्यायालय ने शिकायतकर्ता के खिलाफ धारा 344 CrPC के तहत अलग से कार्यवाही शुरू करने और FIR दर्ज कराने के निर्देश दिए। कोर्ट ने साफ किया कि कानून का दुरुपयोग किसी भी सूरत में स्वीकार नहीं किया जा सकता।
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